Saturday, May 11, 2013





हर वक़्त लगता है की कुछ कीमती सा खो गया गया है ,
ढूँढने निकलती हूँ  जब , तो क्या खोया मैंने समझ नहीं आता  है 

लगता है जैसे वो किताब जो पढ़नी  शुरू की थी मैंने , वो अब भी अधूरी है ,
पर पन्ने  छानती हूँ जब तो वो खोया हुआ जुमला कहीं मिल नहीं  पता है 

लगता है जैसे अरसों हुए घर लौटे ,
घर की तरफ निकलती  हूँ जब तो लौट  जाने का रास्ता नज़र नहीं आता है

कभी हँसते - हँसते एक आंसू पलकों पर उतर आता है,
फिरसे मुस्कुराने की कोशिश करती हूँ जब , तो वो हँसता सा लम्हा याद नहीं आता है।

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