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Saturday, December 17, 2016

दिसम्बर

दिसम्बर तुम आए हो फिर एक बार....
अपनी अलविदा वाली चिठ्ठी और हिसाब किताब का खाता लेकर....

कहो...
किस बात का हिसाब दूँ इस बार ?

सर्दी की रातों में उन नर्म  हाथो के अलाव का....
या कोहरे के  पीछे से झांकती हुई अलसाई सी सुबहों का...

या कहो हिसाब दूँ तुम्हे  अदरक वाली चाय में घुली  उन बेहिसाब बातों का....

क्या गिनना चाहोगे एक ज़िद्दी बच्चे सा भींच रखा था जिन्हें
उन रेत से पलों को....

या जानना चाहोगे की कितनी बार ये चाहा मैंने
की इस बार तुम ना आओ...
और कितनी बार कहा मैंने की बस अब सब्र नहीं होता तुम आ जाओ....

छोड़ो ना ...
वक़्त और थोड़ा ही तो  है हमारे पास

चलो इस बार यादें समेटेंगे

तुम जताना की कैसे याद रखूं तुम्हे
और मैं मनाऊं की कितना भूल जाऊं तुम्हे....

कहोना...
इस बार कुछ बातें क्या करोगे मुझसे



Saturday, September 5, 2015

प्रगति की लहर

सुना है इस देश में प्रगति की लहर आई है,
मेरे घर के सामने से गुज़रती हुई चौड़ी चौड़ी सड़कें भी मुझसे यही कहती है,
प्रगति के आने से ही मैने ये शकल पायी है।

उन सड़कों पे दौड़ती हुई तेज़ गाड़िया जब मेरे पास से गुज़रती है,
वो भी मेरे कानों में ऐसा ही कुछ कहती है।

और ऊंची ऊंची इमारतें जब मेरी और देखती हैं
तो प्रगति वाली हील पहन वो
और ऊँची दिखती हैं।

फिर क्या मेरे गाँव की ज़मीन तक अभी ये खबर नहीं पहुंची है,
की उसके चमड़ी पे दरारे है
और फसल से लहलहाने वाले होंठ सूख गए हैं।
क्या वो इतनी नासमझ है की प्रगति वाली ये क्रीम उसने अब तक नहीं लगायी है।

क्या उसे नहीं मालूम की हम बढे जा रहे है एक सुन्दर सशक्त देश की तरफ,
फिर वो ज़मीन क्यों दहाड़े मार मार के रोती  हैं.
क्यों चुप चाप दम तोड़ नहीं देती,
न जाने किसकी सहमति की आस लिए बैठी है।

क्यों वो बार बार अपना कुरूप चेहरा सामने ले आती है,
और प्रगति के पाउडर से लिप्त इस देश की बड़ी बड़ी सड़को, इ
मारतों की खूबसूरती को
दाग लगाती है।

क्या ये इतनी नासमझ है
की ये नहीं जानती की इसके कटे फटे चेहरे पर
या इसके आत्महत्या कर लेने पर
ये प्रगति की लहर रुकेगी नहीं।
हम ढांक लेंगे इसकी बदसूरती को
चौड़ी  चौड़ी सड़कोंं के और ऊँची ऊँची इमरतोंं के पीछे,

क्या ये नहीं जानती की प्रगति की लहर में बह चले इस देश के चमचमाते चेहरे पर,
इस भद्दे से दाग का कोई अस्तितव नहीं,

फिर भी नजाने क्यों ये दहाड़े मार मार के रोती  है.
क्यों ज़िंदा है अब भी
क्यों चुप चाप दम तोड़ नहीं देती है।


Tuesday, September 1, 2015

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी ऐसी जिओ, जब राख बन धुंआ हो जाओ,
तब भी किसी की ज़हन की वादियों में महकते रहो। 

Thursday, August 27, 2015

झांसी की रानी से एक मामूली कर्मचारी तक का सफर।

बैंगलोर की सड़कों पर हर सुबह मैं खुद को झांसी की रानी सा समझती हूँ,
अपनी दू - पहिया मोटर पे सवार गड्ढों से बने रास्तों, लाल बत्तियों और इधर उधर से आती जाती गाड़ियों के बीच से जब रास्ता बना, अपनी रणभूमि (दफ्तर) पहुँचती हूँ।

मगर रणभूमि पहुँचते ही असलियत सामने आ जाती है,

जब यहाँ प्रवेश के लिए भी एक अदना सी मशीन की इजाज़त लेनी पढ़ती है।

जब लैपटॉप की तोप  से मेलों की बौछार होती है,

मैं चुप चाप सारे हथियार डाल देती हूँ।

आत्म समर्पण करती हूँ  और अपने क्यूबिकल रूपी  कारागार में बंद हो जाती हूँ,

न जाने कितने सालों से ये सिलसिला चला जा रहा है ,
जब मैं हर सुबह झांसी की रानी और फिर एक मामूली कर्मचारी बन जाती हूँ। 

Thursday, August 20, 2015

नारीवाद का ड्रामा

मेरे दफ्तर के नीचे एक पान वाले की है दुकान,
दुकान वाला लगता है, यू पी का हैं जनाब 

मैं अक्सर उससे पान-खजूर लेती हूँ,
कभी कभार कुछ बातें करने की कई कोशिशें भी करती हूँ,

पर ऐसा लगता है की वो मुझसे बात करते हुए कतराता है,
बहुत सोचा पर कारण समझ नहीं आता है,

आज मैंने उससे आखिर पूछ हि लिया,
भैया आप क्या यू पी से हैं ?
 ये पान खजूर तो बहुत बढ़िया बनातें है,
क्या इस शहर की हवा आपको अभी तक नहीं भाई है ?
क्यों इतने चुप चाप से रहते हैं
क्या कोई समस्या छायी है ?

वो पहली बार थोड़ा सा मुस्कुराया,
बोला मोहतरमा गप्पें तो हम बहुत हांकते हैं,
पर इस शहर की महिलाओं से ज़रा कतराते हैं। 

मैंने पुछा महिलाओं ने उसका ऐसा क्या बिगाड़ा है,
वो बोला नहीं नहीं अभी तक कुछ बिगाड़ा तो नहीं है,
पर सुना है शहरों में पढ़ी लिखी,
ए सी ऑफिसों में काम करती हुई, बड़ी गाड़ियों में घूमती हुई,
महिलाओं ने मिलकर कोई मोर्चा संभाला है। 

सुना मोर्चे का नारीवाद के नाम से बोलबाला है। 
अब मतलब तो कुछ हमें समझ नहीं आता है,
पर मुन्नी की अम्मा ने पिछले दिनों संभल कर रहने को कहा था,
बोला पास के बिरजू की बढ़ी धुनाई हुई उस दिन, गलती से एक महिला से टकरा गया था,
सुना है उस महिला के हाथों में जो नारीवाद का जो झंडा था ज़रा बिगड़ गया था। 

अब हम तो इस शहर में दो वक़्त की रोटी कमाना चाहते हैं,
मुनिया को पढ़ा लिखा कर डॉक्टर बनाना चाहते हैं। 
सीधी सादी सी ज़िन्दगी है मैडम,
इसलिए इस शहर की महिलाओं और नारीवाद से बहुत घबरातें हैं। 






Tuesday, March 31, 2015

मुद्दा क्या है

मुद्दा है ही यही की कोई मुद्दा ही नहीं,
तो चलो इधर - उधर, यहाँ - वहां से किसी मुद्दे की पूँछ ही पकड़ लें,

कुछ और बन पढ़े ना पढ़े एक बेमतलब सा मुद्दा अपने नाम ही करले,

कम से कम मुद्दे की पूँछ में मुद्दे सी आफत तो नहीं,
पीछे ही तो रहना है, असल में कुछ करने की ज़रूरत भी नहीं !!

#mychoice #hischoice #hypocrisy #vogue


Friday, March 27, 2015

चलो एक बार फिर इन जूतों को उतार दें

चलो एक बार फिर इन जूतों को उतार दें
ज़मीन से वो नाता फिर एक बार जोड़ लें,


वो कांटे जो चुभे थे पैरों में तब

न जाने क्यों, उनकी टीस बड़ी मीठी सी लगती है अब,


इन चमचमाते पैरों को चलो फिर से मिटटी से सवार लें,

चलो एक बार फिर इन जूतों को उतार दें



Thursday, March 26, 2015

राजा से रंक

कल तक उनको पलकों पर बिठाया 
उनकी जीत में जश्न मनाया 
उनकी मेहनत के कंधे पर, अपनी देशभक्ति का डंका बजाया !
जब एक बार हुआ हार का सामना,
जब सच में था उनका हौसला बांधना, 
वाह रे सच्चे भारतवासियों, 
उन्हें राजा से रंक बनाया। 





Wednesday, March 18, 2015

एक छोटी सी  चिंगारी सुलग रही है कहीं ,
धुआं भी उठता है कभी कभी  ज़रा सा,
क्या इंतज़ार करूँ  की एक दिन ये  खुद ही भड़क जाए शायद, 
या हवा दूँ थोड़ी सी और जला  दूँ सब कुछ !

Tuesday, March 17, 2015

पुरानी डायरी

अलमारी की किसी भूली हुई दराज से, आज वो पुरानी डायरी निकल आई.
थोड़ी खट्टी, थोड़ी मीठी नजाने कितनी यादें साथ ले आई,
सोचा था आज का दिन भी गुज़र जाएगा मुर्दों की तरह,
पर एक पुराने दोस्त के जैसी वह डायरी, आज के लिए थोड़ी सी ज़िन्दगी साथ ले आई !!


Monday, March 16, 2015

एक अन्जुमन

थोड़ा थोड़ा  दर्द बांटा, थोड़ा सा मुस्कुराए भी,
कुछ नज़्मों का तोहफा दे आये, कुछ ले आये उधार भी,

थोड़ी सी सैर हम भी कर आये दोस्तों के आसमान की,
और एक अदना  सा टुकड़ा ज़मीन का, कर लाये अपने नाम भी !!

Saturday, June 21, 2014

आजकल हर सुबह पूछते हो तुम मुझसे 
बड़ी थकी थकी सी लगती है आँखें तुम्हारी 
शायद सोई नहीं हो रात भर !

हैरान हु मैं अपनी किस्मत पर, 
खुश हूँ की चलो तुम्हे  ख्याल तो आया मेरा,
या गम करूँ की मेरे तकिये का कोना जो गीला है आज फिर,
तुमने एक बार भी गौर नहीं किया उसपर 

Translation

Every Morning, you ask me
why do my eyes look so tired.

amused at my fate,

I ask Myself
should I rejoice your attention.
or be anguished that, even today you did not notice the moist edges of my pillow
कभी - कभी कहानियां लिखती हूँ,
कुछ बीते हुए लम्हों को नया मोड़ देकर,
कुछ आने वाले कल के सपने सजाकर। 

और इंतज़ार करती हूँ,
पर ना  बीता हुआ पल बदलता है,
ना ही आने वाला कल सवांरता है ,

रह जाती है तो मेरी कहानियां,
जिनके साथ ख्यालों में ही सही, मेरे सपने मेरी उम्मीदें सांस लेती हैं ,
जिनके साथ शब्दों में ही सही, पर थोड़ी सी ज़िन्दगी जी लेती हूँ मैं !

Translation

Sometimes I write stories.
stories about the past with a new twist.
stories about the dreamy future.

and I wait...

But neither the past changes it's course.
nor the future seems any better.

But my stories remain
through them i live my dreams and my hopes don't die.
 through them i feel alive at least for a while.
सोचती हूँ की ये ज़िन्दगी, शायद ऐसी ही होनी थी 
इतना ही मिलता था शायद !

पर फिर भी लगता है 
उस मोड़ पे जाकर देख आऊं एक बार !

कुछ सवाल जो छोड़ आई थी वहां,
शायद अब उनका जवाब मिल जाये !

Translations

sometimes i wonder,
may be this is what was suppose to happen.
may be this is what i was entitled to get.

but then i still feel.
may be i should revisit that turning of life.
the questions which i left unanswered there.
may be now i will get the answers for those

Wednesday, June 18, 2014

अजीब  होता है ये रिश्ते ,
रिवाज़ों और  दस्तखतों के बीच में खो जाते हैं मायने ,

बंद दरवाज़ों के अंदर सिसकियाँ भरता है,

पर कोई  खोलता नहीं दरवाज़े की कड़ी,
दो जिस्म तो मिल जाते हैं आपस में ,
लेकिन रूह को खबर तक नहीं होती !

और कुछ रिश्ते वो भी हैं 
होते 
 कभी कोई रस्म, कोई कागज़ का टुकड़ा कोई दस्तखत नहीं होता
पर, लगता है जैसे एक ही रूह को दो जिस्मों में भर दिया हो उसने।

लफ़्ज़ों की ज़रुरत नहीं होती, बस धड़कनें करती है बातें,

नाही कोई बंधन है होता, ना किसी को बांधने की चाहत है होती 

होता है तो बस  एक दूसरे के साथ होने का एहसास,

लम्हों से ज़िन्दगी नहीं होती,
हर एक लम्हे में ज़िन्दगी होती है !

Translations

These relationships are weird isn't it ?

meanings get lost between traditions and signatures.

it suffers and cries behind those closed doors,

but no one dares to open the door.

two bodies unite, 
but souls remain as strangers.

but there are those relationships also,

no rituals, no signatures, no piece of paper is required.
but it seems like two bodies have a single soul.

words are not required.

when hearts have conversation.
there are no need of control, nor any restriction.

all that is there is  feeling of togetherness and contentment.
life is no longer simply a collage of moments.
every moment is alive 
and every moment has a life.

Friday, June 13, 2014

साँसे





तुम शायद मेरे लिए चलती साँसों के जैसे हो गए हो,
साथ रहते हो  पर तुम्हारे साथ का एहसास नहीं होता,
जब तक  थम जाने की नौबत न आये,
 तब तक तुम्हारी ज़रुरत का आभास नहीं होता !

कभी बातें तो नहीं की साँसों से, 
पर मेरे साथ वो भी, कभी धीमी होती, कभी चढ़ती जाती है,
पर  पता भी  नहीं चलता। 
तुम वैसे ही रोते हो,  हँसते हो साथ मेरे ,पर तुम्हारे हंसने-रोने का ख्याल नहीं आता !

बात ये नहीं की तुम्हारी ऐहमियत की समझ नहीं मुझे 
पर साँसे जिस्म का हिस्सा ही तो है,
 वैसे ही तुम्हारे खुद से अलग होने का एहसास नहीं होता।। 





Thursday, September 26, 2013


कभी कभी यूँ ही मुड़कर उन खंडहरों में घूम आती हूँ,
ऐसा नही उसे फिरसे बसाने का अरमान है। 

पर, उन टूटी फूटी दीवारों के बीच ज़िंदगी हँसती थी कभी,
वहाँ जहाँ मकड़ी के जाले हैं अब, सपने बस्ते थे कभी,

वो उजड़ा सा बगीचा रंगों से खेलता था कभी,
उन धूल से भरी तस्वीरों में मुस्कुराते लम्हे बस्ते थे कभी,

मैं तो वहाँ बस अपने ज़िंदा होने का एहसास करने चली जाती हूँ
उस बर्बाद खंडहर से इतनी मोहब्बत थी कभी , 
की अब उसकी बर्बादी पे रोना नही आता,
बस एक सकून है की वो अब भी खड़ा है वहीं


Sunday, May 12, 2013




दिल करता है फिरसे पापा की गुड़िया बन जाऊं,

थके हारे जब लौटे पापा, अपनी छोटी - छोटी हथेलियों से उनका माथा सहलाऊं।

कड़कती सर्दियों में पापा की शौल में लिपटे हुए,
उनकी गोद में ही सो जाऊं।

माँ जब डांटे किसी बात पर ,
तो पापा के पास अर्ज़ी ले जाऊं।

पापा के साथ नुक्कड़ की उस दूकान पे जाकर,
मनमानी कर खूब सारी चॉकलेट ले आऊं।

बहुत हुआ ये खेल बडों का,

दिल करता है बस अब पापा की गुड़िया बन, उस चौखट फिर लौट जाऊं।

Saturday, May 11, 2013


बारिश वाली एक वो शाम थी,
सड़क किनारे झगड़े थे जब हम,तर बतर पानी में भीगते हुए
कभी रूठते , कभी मनाते ,सरसराती ठण्ड से  कांपते हुए।

बारिश वाली एक वो शाम थी ,
जब एक  छोटी सी छतरी लेके मैंने तुमको घर तक छोड़ा था ,
वो अदना सी छतरी  बारिश के तेज़ झोंके रोक सके इतनी कहाँ औकात थी उसकी,
वो तो तुम्हारे साथ चंद लम्हे चुराने का एक बहाना  था।

बारिश वाली एक वो शाम थी,
जब तुम मिलने नहीं आये थे,
खिड़की के किनारे बारिश की बूंदों से खेलते हुए ,
न जाने कितने घंटो हमने फ़ोन पर, बातें करते हुए बिताए  थे।

बारिश वाली एक शाम आज भी है पर ,
अब हम झगड़ते नहीं है,
अदना सी वो छतरी आज भी है कहीं, पर अब हम साथ चलते नहीं है।
अब हम साथ में बारिश को साथ में बैठकर तकते ज़रूर है,
पर करने को बातें नहीं है।

बारिश वाली वो शाम तो आज भी आई है,
पर बूंदों में अब वो बात नहीं है।




हर वक़्त लगता है की कुछ कीमती सा खो गया गया है ,
ढूँढने निकलती हूँ  जब , तो क्या खोया मैंने समझ नहीं आता  है 

लगता है जैसे वो किताब जो पढ़नी  शुरू की थी मैंने , वो अब भी अधूरी है ,
पर पन्ने  छानती हूँ जब तो वो खोया हुआ जुमला कहीं मिल नहीं  पता है 

लगता है जैसे अरसों हुए घर लौटे ,
घर की तरफ निकलती  हूँ जब तो लौट  जाने का रास्ता नज़र नहीं आता है

कभी हँसते - हँसते एक आंसू पलकों पर उतर आता है,
फिरसे मुस्कुराने की कोशिश करती हूँ जब , तो वो हँसता सा लम्हा याद नहीं आता है।